समाज किस हद तक प्रतिक्रियावादी हो चुका है?

इस तथ्य की तस्दीक़ करनी हो तो किसी घटना के ठीक बाद उतरिये आभासी दुनिया में और खंगालिए फेसबुक और ट्वीटर । आधी जनता टिप्पणीकार है, सब विशेषज्ञ हैं, सभी का नज़रिया है भले उस नज़रिए का वज़न पाव भर न हो।

रामदेव ने ऐलान किया कि उनके पास एक नुस्ख़ा/दवा/औषधी/घुट्टी/मेडिसिन (जो समझदारों को सही लगे) है। जिससे नोबल कोरोना वायरस का सामना करने में आसानी होगी या कारगर साबित हो सकती है लेकिन आभासी दुनिया के जानकारों की तत्परता का आलम देखिए, भले उन्हें पता हो या न हो कि कोरोना वायरस के पहले ‘नोबल’ लगा है यानी नया और उच्चतम।

एक ऐसा फ्लू जिसका फ़िलहाल न तो उपचार है और न ही उपचार की गुंजाइश। ऐसे में बाबा रामदेव ने एक दावा किया और आभासी जगत के सम्पूर्ण प्रखर टिप्पणीकार उनके दावों पर टूट पड़े । जैसे सबसे बड़ी दिक्कत यही हो कि आख़िर एक बाबा ने कैसे कोरोना पर समाधान जैसा कुछ तैयार कर लिया?

इस वक़्त लोगों के लिए यह बात अहमियत नहीं रखती कि पिछले हफ़्ते से हमारे देश में हर दिन 14 हज़ार से अधिक मरीज़ मिल रहे हैं आख़िर इनका उपचार कैसे होगा? ऐसे कठिन समय में अगर एक व्यक्ति का दावा कुछ फीसद भी सही होती है तो इससे देश के लोगों का कितना फ़ायदा हो सकता है।

ख़ुद को बुद्धिजीवी जैसा दिखाने की दौड़ इतनी अंधी कैसे हो सकती है कि आप एक इंसान की पूरी बात तक नहीं सुन सकते हैं?इसके पहले इज़रायल ने कोविड 19 की दवा बनाने का दावा किया था, नतीजे क्या हैं फ़िलहाल कोई नहीं जानता और उसके पहले इटली ने दावा किया था कि उन्होंने इस वायरस से लड़ने लायक़ एंटीबॉडी तैयार कर ली है। वहाँ भी नतीजे की सूरत क्या निकली राम जानें!

लोगों को बाबा रामदेव के लिए ऐसी भाषा का उपयोग करते देखा जैसे रामदेव ने उनसे कर्ज़ लेकर दवाई बनाई हो। बाबा रामदेव की नागरिकता स्विट्ज़रलैंड की नहीं है, इस देश की सरकार के नाम का आधार कार्ड है उनके पास।

अगर कोरोना जैसी महामारी न हुई होती तो हमारे जैसे नई पीढ़ी के समझदारों को पता ही नहीं लगता कि ‘गिलोय’ किस चिड़िया का नाम है और रामदेव ने किया ही क्या है? उनकी दवा में ऐसी ही चीज़ें हैं जिसका उपयोग बीते कुछ समय से सभी कर रहे हैं।

दालचीनी, मुलेठी, जायफल, कालीमिर्च, ब्राह्मी, पिप्पली, शंखपुष्पी इत्यादि। कुल मिलाकर जुगत रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की है क्योंकि इन तत्वों से वही होता है। आयुर्वेद भी यही बात कहता है।

तो इस बहस में परेशानी कहाँ आ रही है? अगर किसी चीज़ से आपकी इम्युनिटी सुधरती है तो उस दवा पर इतना उन्मादी होने की क्या वजह है? देश के फार्मा सेक्टर में कितने बड़े बड़े माफ़िया हैं कभी उन पर भी सवाल उठाइए!

मैंने आज तक नहीं सुना किसी फार्मासूटिकल कंपनी के सीओओ की आलोचना हो रही है। नाम ही नहीं पता होगा, आलोचना छोड़िए और कौन अवसरवादी नहीं है? अपोर्च्यूनिस्ट या ऑप्टिमिस्टिक नहीं है? हम नहीं हैं या आप नहीं हैं? या मनमाने दाम पर दवा बेचने वाली कंपनी अवसरवादी नहीं हैं, जिनके विरोध में हम एक वाक्य नहीं लिखते।

हमें ड्रग्स, टेबलेट्स और केमिकल पर अंधा भरोसा है लेकिन जो हमारे देश का मौलिक है, वह हमारी हल्की और सस्ती टिप्पणियों में सिमट कर रह जाता है। दवा का दावा किया गया है, दवा खिलाई नहीं जा रही है। सरकार रामदेव की दवा खिलाने के लिए संसद में विधेयक पारित नहीं करा रही है और बाबा रामदेव उतने अतिप्रशंसनीय क़िरदार भी नहीं हैं, बेशक बड़बोले हैं, लट्ठमार शैली है उनकी।

एक धैर्यधारी योगी सलवार पहन कर दौड़ भाग नहीं करते। मायने बाबा रामदेव योगियों जैसे शांत और सहज भी नहीं हैं लेकिन कोई आतंकवादी भी नहीं हैं। और व्यापारी? कौन व्यापारी नहीं है? हमारी जागरूकता तब कहाँ चली जाती है जब हम नींद की कोई भी दूसरी तीसरी टेबलेट चबा कर सो जाते हैं।

टेबलेट में क्या मिला है? टेबलेट का दाम कितना है? टेबलेट का असर क्या होगा? ऐसे सवाल हमारे ज़ेहन में उठते ही नहीं। इसलिए निरर्थक कूदिये मत, कूदने के लिए पूरा जीवन शेष है। हर मौके पर अपना स्वैग दिखाना ज़रूरी नहीं है

आप कितने इंटलेक्च्युअल हैं यह इससे साबित नहीं होता कि आप दिन में कितनी बार रामदेव के मज़े लेते हैं। हर मुद्दे पर अपने हिपहॉप क्वेशन फिट कर देने से आप नॉलेजबल पर्सन नहीं बन जाएंगे।

रामदेव की दाढ़ी है और आसाराम की भी दाढ़ी है, आसाराम ने क्या बनाया आप जानते हैं और रामदेव क्या बना रहे हैं वह आपके सामने है।

-विभव देव शुक्ला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

two × five =